Shri Gusaiji
प्राकट्य – पौष कृष्ण ९ वि. सं. १५७२
लीला प्रवेश – माघ कृष्ण ७ वि. सं. १६४२
भगवान श्रीगोकुलनाथजी ने महाप्रभु श्रीवल्लभाचार्यजी को वचन दिया था कि “मैं तुम्हारे पुत्र के रूप में अवतार लूंगा।” उनके अनुसार पौष कृष्ण ९ वि. सं. १५७२ को श्रीविट्ठलनाथजी का प्राकट्य हुआ।
आपने वेद, शास्त्र, स्मृति (धर्मशास्त्र), मीमांसा, न्याय, व्याकरण तथा भक्ति सम्बन्धी ग्रंथों का गहन अध्ययन किया। पुष्टिमार्ग में जो सर्वोत्तम कृष्ण-सेवा प्रणाली देखी जाती है, उसका श्रेय श्रीगुसाईंजी को ही जाता है।
श्रीगुसाईंजी ने सम्पूर्ण देश का भ्रमण कर अनेक स्थलों पर पुष्टिमार्ग का प्रचार-प्रसार किया। आपने अपने जीवनकाल में अनेक ग्रंथों की रचना की, जिनमें से आज भी कई उपलब्ध हैं। आपने अनेक शिष्यों को दीक्षा दी तथा उन्हें श्रीकृष्ण-सेवा के मार्ग पर अग्रसर किया।
आपके समय में अनेक राजा-महाराजा, धनिक तथा सामान्य जन आपके चरणों में शरणागत हुए। आपने समाज में धर्म, भक्ति और सेवा की भावना को मजबूत किया।
आपके ज्येष्ठ पुत्र श्रीगोकुलनाथजी तथा अन्य संतों ने आपके मार्गदर्शन में पुष्टिमार्ग की परंपरा को आगे बढ़ाया। आपने “अष्टछाप कवियों” को स्थापित किया, जिन्होंने भक्ति-साहित्य को समृद्ध किया।
श्रीविट्ठलनाथजी (श्रीगुसाईंजी) ने लगभग ४० वर्षों तक अद्वितीय रूप से पुष्टिमार्ग का विस्तार किया। आपके द्वारा स्थापित सेवा-पद्धति आज भी वैष्णवों द्वारा अपनाई जाती है।
आपका जीवन और उपदेश आज भी भक्तों के लिए प्रेरणास्रोत हैं तथा आपकी महिमा का वर्णन करना अत्यंत कठिन है।