Shri Gokulnathji
आपश्री का जन्म वि.सं. १९४५ में हुआ। आप श्रीजीवनजी के यहाँ चोपासनी से गोद पधारे। आपका जन्म चोपासनी वाले श्रीदामोदरलालजी महाराज व श्रीमति श्रीरानी बहुजी के गृह हुआ।
आप ७ वर्ष की वय में जतिपुरा गृह के श्रीरुक्मणी माजी महाराज के चबई मोटा मंदिर घर में गोद पधारे। आपश्री की भजन परायणता तीनों लोकों को भगवन्नाम स्मरण की प्रेरणा देती है।
आपश्री ने भगवत्सेवा में, सामाजिक, शैक्षणिक, व्यवहारिक (सजातीय), साहित्य-संगीत-कला के स्तरों पर बदलते युग के साथ इतने महानतम् कार्य कीये जिनसे ग्रंथों की श्रृंखलाएँ लिखी जा सकती हैं।
आपके जीवन चरित्र में जिन धर्माचार्योचित जीवन मूल्य तथा सद्गुण विलास करते थे उनकी यशोगाथा का गान कोई भी आधुनिक आचार्य करने में सक्षम नहीं है।
आपश्री भगवत्स्वरुप सेवा के तत्व स्पर्शी विद्वान, श्रीगुसाँईजी के सातों घरों की सेवा प्रणालिका के निष्णात एवं गौ-ब्राह्मण प्रतिपालता के आदर्श आचार्य रहे। आपश्री को “प्रभु श्रीगोवर्धनधर-श्रीनाथजी” ने अंतःकरण गोचर हो स्वप्न में बहुत सी अलौकिक आज्ञाएँ कीं जिनके फल स्वरुप आपने अनेक विविध मनोरथ- छप्पनभोगदि तथा एक विशाल जनसमूह के साथ ८४ कोस व्रज परिक्रमा की।
व्रजयात्रा के दरम्यान महामारी तथा अन्य कई प्रकार की बीमारियाँ फैलने पर आपश्री ने सर्वजन सुखाय-सर्वजन हिताय अपने द्वारा चलते “श्रीबालकृष्ण औषधालय” के माध्यम से प्रचुर मात्रा में औषधियों का वितरण करवाया कर समस्त व्रज-प्रदेश को आरोग्य का दान कीया। आपश्री के कार्यकाल में श्रीबालकृष्ण पाठशाला, श्रीबालकृष्ण पुस्तकालय, श्रीबालकृष्ण छात्रालय, श्रीबालकृष्ण औषधालय तथा श्रीमद्गोकुल में श्रीवल्लभ गौशाला आदि अनेक प्रवृत्तियाँ चलती थीं।
भारत के प्रसिद्ध कृष्णमंदिर केरल प्रदेशस्थ श्रीगुरुवायूर में आपने हरिजन प्रवेश को रोकने में एक विशाल संगठन का सफल नेतृत्व कीया व उसकी विजयश्री के रुप में शताधिक गौओं से युक्त एक गौशाला भी देवस्थानम् को समर्पित की। आपश्री ने गौ-हत्या निषेध के विभिन्न क्रांतिकारी आयोजनों में अपने ज्येष्ठ पुत्र व पुत्र वधू को बांग्लादेश – ढाका – नवाखली तक भेजा। आज के युग में आपश्री के समान युग पुरुष की संप्रदाय को नितांत आवश्यकता है। आपश्री को शत-शत नमन।