Shri Jivanji
आपश्री का प्राकट्य वि. सं. १८५९ में हुआ। आपश्री गोवर्धनेशजी के यहां गोद पधारे। आपश्री बहुत विद्वान हुए तथा बहुप्रतिभाशाली भी। आपश्री रुद्र-वीणा वादन कीया करते थे तथा कला-प्रेमी हुए।
आपश्री ने बहुत संस्कृत साहित्य का निर्माण कीया, तथा आपके द्वारा लिखे संस्कृत स्तोत्र, श्लोक, विज्ञप्तियाँ, ध्यानादि अनेक साहित्य संप्रदाय में प्रचलित भी हैं, तथा कई अब अप्राप्य भी हैं। आपश्री ने ब्रह्मसूत्र पर वाल्लभ मतानुसारी वृत्ति भी प्रकट की है। संप्रदाय के मूर्धन्य विद्वान शास्त्रीजी पंडित श्रीगट्टूलालजी को तयार कराने का श्रेय भी आप ही को जाता है। आपश्री के ही काल में बंबई – मोटा मंदिर में अनेक भव्यातिभव्य मनोरथ हुए तथा धर्म सभाएँ हुई जिससे संप्रदाय की कीर्ति में बहु विध वृद्धि हुई।
आपश्री ने अपने प्राकट्य के ६वें दिन ही वचनामृत द्वारा मोरबी – श्रीमहाप्रभुजी की बैठक को प्रकट कर समस्त लोकों को चमत्कृत व आश्चर्यचकित कीया। आपश्री ने बहुत समय तक बसरा से मोतीयों का व्यापार कीया इसी कारण आप, अपने पिताश्री की तरह “रोकडीया महाराज” के नाम से भी विख्यात हुए। इस व्यापार के चलते आपश्री ने श्रीश्रीजी, श्रीनवनतप्रियाजी, श्रीमुकुंदरायजी आदि तथा अपने सेव्य स्वरुपों के विविध एवं विलक्षण आभूषण सिद्ध कराकर अपने लौकिक व्यवसाय का अलौकिकरण कीया।
आपश्री के कोई आत्मज न होने के कारण आपश्री के बहुजी, श्रीरुक्मणी माजी महाराज ने, श्रीगोकुलनाथजी महाराज चोपासनी से गोद पधराये।