Shri Damodarji

प्राकट्य – श्रावण शुक्ल १५ वि. सं. १६३२

लीला प्रवेश – कार्तिक शुक्ल १० वि. सं. १६९४

श्रीगुसाँईजी के ज्येष्ठ आत्मज श्रीगिरधरजी के तीन पुत्र हुए – जिसमें श्रीदामोदरजी श्रीगिरधरजी के द्वितीय पुत्र हैं। पितृचरण के लीला प्रवेश के उपरान्त, आप सम्प्रदाय की प्रमुख तथा वरिष्ठतम् गादी “गोस्वामी तिलकायत पद” पर विराजमान हुए। श्रीदामोदरजी के तीन पुत्र हुए। आपके प्रथम पुत्र श्रीविठ्ठलेशरायजी, द्वितीय पुत्र श्रीगिरधरजी तथा तृतीय पुत्र श्रीमुरलीधरजी हुए।

आपश्री वेद-वेदान्त के निष्णात विद्वान हुए। सकल शास्त्रों का आपने गंभीर अध्ययन कीया। श्रीमद्वल्लभाचार्यजी के सम्पूर्ण संस्कृत वाङ्मय का आपने अनुशीलन कीया। वल्लभ दर्शन के आप श्रेष्ठ प्रणेता हुए। आपने प्रभु प्रीत्यर्थ अनेक मनोरथ तथा दिव्यातिदिव्य उत्सव कीये।

श्रीदामोदरजी का व्यक्तित्व अत्यंत प्रभावशाली था। तत्कालीन शासकों पर आपके गुणातीत स्वरूप का अत्याधिक प्रभाव था। आपके गुणों से सभी भक्तजन, हिन्दू जन सामान्य तथा समस्त वैष्णवजन आपके परम् भक्त हुए।