Shri Girdharji

प्राकट्य – कार्तिक शुक्ल १२ वि. सं. १५९७
लीला प्रवेश – पौष कृष्ण २ वि. सं. १६४७

आपश्री, श्रीविट्ठलनाथजी (श्रीगुसाईंजी) के छठे पुत्र हैं। आपसे ठीक पहले पितृवरण श्रीगुसाईंजी की तरह वेद, शास्त्र, मीमांसा तथा एक अद्वितीय आचार्य हुए। आपश्री सदा ही अपने भ्राता के साथ “भट्ट श्रीनिवासजी”, “भट्ट हरिव्यासजी” तथा अन्य विद्वानों के साथ शास्त्रार्थ करते रहते थे।

आपने निज सेवा स्वरूप श्रीमदनमोहन प्रभु की सेवा में तत्पर रहते थे। पुष्टिमार्ग में श्रीगिरधरजी ने सदैव “सत्संग-प्रसंग” का दिव्य आयोजन करने का संकल्प किया तथा आपने अपने पितृवरण (श्रीगुसाईंजी) के संकल्प को आकार प्रदान करते हुए “भक्त-रसिकों” का दिव्य उत्सव किया।

आपने एक साथ अनेक उत्सव-प्रसंगों का आयोजन किया तथा भक्तों में भी अनेक गुण-महात्माओं का उल्लेख प्राप्त होता है। ऐसा कहा जाता है कि आपश्री के समय में “राग-रागिनी” ने आपके लिए स्वयं को प्रकट किया।

आपने ८४ कोठियों के लिये मधुर भक्ति का संदेश प्रसारित करवाया। आपके समय में भक्ति का व्यापक विस्तार हुआ।

आपने अपने जीवनकाल में अनेक ग्रंथों की रचना की तथा समाज में धर्म, भक्ति और सेवा का प्रचार-प्रसार किया।

श्रीगिरधरजी एक उत्कृष्ट गायक, विद्वान आचार्य तथा पुष्टिमार्ग के महान प्रचारक थे।