Shri Gokulnathji

आप श्रीकाका-वल्लभजी के सप्तम पुत्र हुए। आपश्री का प्राकट्य वि. सं. १७५० में हुआ। आपश्री के पितृचरण श्रीकाका-वल्लभजी ने, आपश्री के माथे दो स्वरुप पधराये, परंपरया प्राप्त रजो क्षत्राणी के सेव्य “श्रीबालकृष्णलालजी” तथा अपने गुरु श्रीहरिराय महाप्रभु के द्वारा प्रदत्त श्रीमाधवभट्ट काश्मिरी के सेव्य लालन (श्रीबालकृष्णजी), आपश्री के माथे पधराये तथा जतिपुरा-सुरभि कुंड पर बिराजने की आज्ञा कर उन्हें जतिपुरा गृह के प्रथम टिकेट के रुप में स्थापित कीया।
श्रीगोकुलनाथजी, बहु प्रतिभाशाली व्यक्ति रहे तथा सदा ही सेवा रस मे मग्न रहते थे।