Shri Gopinathji
प्राकट्य – आषाढ़ कृष्ण १२, संवत १५४७
लीला प्रवेश – वि. सं. १५९९
आप श्री, श्रीवल्लभाचार्यजी के प्रथम पुत्र हैं। आपश्री का प्राकट्य आषाढ़ कृष्ण १२ संवत १५४७ में हुआ।
महाप्रभु श्रीवल्लभाचार्यजी के पश्चात सम्प्रदाय के प्रमुख आचार्यपद पर आप आसीन हुए। आपश्री, प्रभु श्रीनाथजी की सेवा अत्यन्त प्रेम तथा सुव्यवस्थित पद्धति से किया करते थे। आपश्री अत्यन्त एकान्त प्रेमी हुए, जिनके चलते आपने पुष्टि-सम्प्रदाय तथा पुष्टिमार्गीय कृष्ण-सेवा पर अनेक ग्रंथ लिखे। आपश्री को सेवा सागर कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
आपके द्वारा लिखे ग्रंथ कालान्तर में लुप्त हो गये जिनमें से आज कुछ ही प्राप्त होते हैं।
आपश्री तथा आपके पुत्र (श्रीपुरुषोत्तमजी), असमय ही नित्य लीला में प्रवेश गये जिसके कारण आपश्री के अनुज श्रीविट्ठलनाथजी सम्प्रदाय के प्रमुख आचार्य हुए। श्रीगोपीनाथजी स्वयं भगवान बलराम के अवतार हुए और जिनका लीला प्रवेश भी सदेह श्रीगोकुलनाथजी के बलद्वेसी में हुआ।