Shri Kaka Vallabhji

आपश्री का प्राकट्य वि. सं. १७०३ में भाद्रपद कृष्ण १४ को, गोकुल में श्रीमन्महाप्रभुजी की ६वीं पीढ़ी में हुआ। आपश्री का यज्ञोपवित १७११ में हुआ और आपको ब्रह्मसंबंध महाप्रभु-श्रीहरिरायजी ने प्रदान कीया। अतः आपने अपने गुरु के अनुसार भगवत्सेवा बहुत निष्ठा के साथ और दीनता पूर्वक की।

जब प्रभु श्रीनाथजी को ब्रज से मेवाड़ पधराया गया, तब आप ही उस समय, श्रीहरिराय महाप्रभु के साथ- साथ सेवा में अग्रगण्य थे और (श्रीहरिराय महाप्रभु के पश्चात्) उस समय आप ही सबसे अनुभवी तथा वयोवृद्ध थे। इसी कारण तत्कालीन समस्त वल्लभकुल परिवार आपश्री को “काका-वल्लभजी” नाम से संबोधित कीया करते थे।

आपने श्रीनाथजी को १७२६ में ब्रज से मेवाड़ में पधराते समय, मार्ग में भोग के क्रम में “रेंटी-लोटी” सिद्ध कर आरोगते रहे। आप श्रीनाथजी की सेवा पहुँचने के पश्चात नित्य खिमनोर श्रीहरिरायजी के पास जाते और आपसे संप्रदाय के सिद्धांतो का अध्ययन करते। आपने लीला भावना के धोल सहित “दास” छाप से रची है। संस्कृत में लेखादि व्रजभाषा में कीर्तन तथा गुजराती में धोल आदि साहित्य का निर्माण कीया है। आपने व्रजभाषा दल भावना ग्रंथ रचा है और तदनुसार व्रजयात्रा वि. सं. १७६२ में की। आपश्री को अपने गुरु, श्रीहरिराय महाप्रभु के पास से, श्रीमदाचार्यचरण के निधी-श्रीमाधवभट्ट के सेव्य, “प्रभु श्रीबालकृष्णलाल” का भगवद्-स्वरुप भी प्राप्त हुआ जो अद्यतन आपश्री के वंशजों के माथे विराजमान हैं।

आपको “काका” संज्ञा उपनाम से इसलिये अभिहित किया जाता रहा कि आप उस समय गोस्वामी बालकों में वयोवृद्ध रहे। आपने अपने सातों ही पुत्रों को अपने माथे बिराजते निधि स्वरुपों को पधरा दिये थे, ताकि श्रीनाथजी की सेवा तन्मयता से करते रहें। नाथद्वारा में जहाँ आप बिराजते रहे वह स्थान आज भी “वनमालीजी के मंदिर” के नाम से जाना जाता है। यद्यपि निश्चित रुप से आपके नि.ली. प्रवेश के बारे में नहीं कहा जा सकता। फिर भी आप वि. सं. १७८० तक भूतल पर विराजमान रहे। आपके ५२ वचनामृत संप्रदाय में प्रसिद्ध हैं।