Shri Vallabhacharyaji
शुद्धाद्वैत पुष्टिमार्ग के प्रवर्तक, स्वयं भगवान श्रीकृष्ण-मुखारविंद के अवतार, श्रीमद् वल्लभाचार्य का प्राकट्य वैशाख कृष्ण ११ वि. सं. १५३५ को, स्वकुल में १०० सोमयज्ञों के पूर्ण होने पर, भगवान के वरदान के फलस्वरूप पिता श्रीलक्ष्मण भट्ट तथा माता श्री इल्लम्मागारु के यहाँ चंपारण्य में हुआ।
रामनवमी के दिन आपका उपनयन संस्कार संपन्न हुआ तदुपरान्त आपने अल्पवय में ही सकल शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त कर अपनी अलौकिक प्रतिभा का परिचय दिया। ग्यारह वर्ष की आयु में आपने अपनी विद्वत्ता से काशी के विद्वानों को प्रभावित किया तथा मार्गशीर्ष ७ वि. सं. १५४५ में जगन्नाथपुरी में जगदीश मन्दिर में शास्त्रार्थ कीया तथा विजयी हुए। आप द्वारा दिये गये उत्तरों की पुष्टि स्वयं प्रभु जगन्नाथ ने की।
आप, शुद्धाद्वैत दर्शन के प्रचारार्थ तीन बार पृथ्वी परिक्रमा (भारत परिक्रमा) पर पधारे। ओरछा के राजा द्वारा आपश्री का सुवर्णाभिषेक हुआ। आप वि. सं. १५४७ में मथुरा पधारे।
ठकुराणी घाट पर प्रभु श्रीनाथजी ने प्रकट होकर आपश्री को ब्रह्मसंबंध प्रदान कीया तथा दैवी-जीवों को भी यह प्रदान कर उन्हें सेवक करने की तथा पुष्टिमार्ग को प्रकट करने की आज्ञा दी। आपश्री के प्रथम सेवक श्रीदामोदरदास हरसानी हुए तत्पश्चात आपके समस्त पृथ्वी पर कई सेवक हुए जिससे पुष्टिमार्ग का विस्तार हुआ। (श्रीमद् वल्लभाचार्यजी के सेवकों की गणना १,८४,००० बताई जाती है, जिसमें से आपके प्रमुख ८४ सेवकों के प्रसंग संप्रदाय में प्राप्त व प्रचलित हैं।)
आपश्री को फागुन शुक्ल ११ को, स्वप्न में श्रीनाथजी ने अपने प्रकट होने की आज्ञा दी, तत्पश्चात आप प्रभु श्रीनाथजी के दर्शन हेतु पधारे और वहाँ प्रभु श्रीनाथजी ने स्वयं अपनी कंदरा से बाहर पधारकर आपका आलिंगन किया।
तब प्रथम बार श्रीवल्लभाचार्यजी ने प्रभु श्रीनाथजी का श्रृंगार कीया। मोर चंद्रिका-गुंजामाला तथा पाघ-पिछोडा धारण कराया।
“वस्तुतः कृष्ण एव” स्वरूप, श्रीवल्लभाचार्य-महाप्रभुजी ने पुष्टिमार्ग के सिद्धांतों को जन सामान्य को सुलभता से समझाने के लिये अनेक ग्रंथों की रचना की। जिनमें से “षोडश ग्रंथ” (सोलह ग्रंथों का समूह) विशेष रुप से मार्गोय मर्म तथा सिद्धांतों पर प्रकाश करते हैं।
आपश्री के तेज-प्रताप, करुणा-पूर्ण स्वभाव तथा आपश्री की अतुलनीय विद्वत्ता के कारण लोग आपको “श्रीमहाप्रभुजी” नाम से संबोधन कीया करते हैं। आपश्री स्वयं “श्रीकृष्ण” ही हैं, जो इस घोर कलिकाल में इस भूतल पर, अपनी कृपा और अपने वंश द्वारा कृष्णसेवा के माध्यम् से दैवि-जीवों के उद्धारार्थ ही पधारे हैं।