Shri Vithaleshji

श्रीविट्ठलेशरायजी (टिपारा-वाले)

प्राकट्य – श्रावण शुक्ल १४ वि.सं. १६५७ 

लीला प्रवेश – पौष कृष्ण ९ वि.सं. १७११

आप, श्रीदामोदरजी के प्रथम पुत्र हुए। आपका प्रारंभिक जीवन अत्यंत संघर्षमय रहा। प्रभु श्रीनाथजी की सेवा संबंधी अधिकारों पर भाई-बांधवों ने आपश्री के एकाधिकार पर आपत्ति की और आपश्री को दीर्घ समय के लिये मंदिर प्रवेश से भी वंचित कर दीया था। मुग़ल सम्राट शाहजहाँ से भी उक्त विषय पर कहा गया किन्तु परिणाम कुछ नहीं आया।

श्रीविट्ठलेशरायजी पर प्रभु श्रीनाथजी की परम कृपा थी। उन्हें रुदन करते हुए देख श्रीनाथजी से रहा नहीं गया। जब अन्य भाईयों ने श्रीनाथजी के टिपारेवाला श्रृंगार कीया, तब श्रीनाथजी ने टिपारे का श्रृंगार अंगीकार करने से मना कर दीया। प्रभु की आज्ञा अन्य भाईयों को हुई की श्रीविट्ठलेशरायजी मेरी सेवा वर्ष में ६० दिवस करेंगे। प्रभु की कृपा को देख सभी भाई-बांधवों ने पुनः श्रीविट्ठलेशरायजी को प्रभु श्रीगोवर्धनधर-श्रीनाथजी की सेवा करने की प्रार्थना की। श्रीठाकुरजी की सेवा में जब आप पुनः पधारे तो प्रभु की अति कृपा आप पर हुई। आपश्री के मस्तक पर श्रीनाथजी ने स्वयं अपना श्रीहस्त रखा।

आप प्रभु के इस अनुग्रह को देख आनंदविभोर हो गये। इस घटना के बाद ही प्रभु श्रीनाथजी ने पुनः टिपारा का श्रृंगार धारण कीया और उस दिन से आज तक, श्रीविट्ठलेशरायजी को सभी “टिपारावाले-श्रीविट्ठलेशरायजी” के नामसे भी जानते हैं।

मुग़ल सम्राट ने भी बाद में आपको अति सन्मान प्रदान कर श्रीनाथजी को विस्तृत भूखण्ड (जमीन) समर्पित कर अपने को कृत-कृत्य अनुभव कीया। आपश्री को पुनश्च “गोस्वामी तिलकायत” के रुप में अति आदर प्राप्त हुआ।

श्रीविट्ठलेशरायजी के चार पुत्र हुए। आपश्री के प्रथम पुत्र श्रीगिरधरजी हुए, द्वितीय पुत्र श्रीगोविंदजी, तृतीय पुत्र श्रीबालकृष्णजी तथा चतुर्थ पुत्र श्रीकाका-वल्लभजी हुए।